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बुधवार, 7 जनवरी 2026

रजाई में

तन मन कॉंपा, ठंड बढ़ गयी, सूरज छिपा रजाई में।
कुहरा, बादल, शीत मिल गये,बिक गये अक्षर ढाई में।
गर्म श्वास की, चाह चढ़ गयी, बढ़ गयी प्रीति लोनाई में।
खुल खुल खॉंसें, बुढ़ऊ घर में, मर गयी मौज दवाई में।।

शनिवार, 29 जून 2019

आग


हमने मेघों से जल माँगा,
सूरज ने बरसाई आग।
दादुर भूल गए टर्राना,
वन उपवन में धाई आग।।

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रविवार, 19 जनवरी 2014

शीत

उठा क्षितिज से कुहरे का दल,

लील गया सूरज का संबल।

लील गया घर खेत बाग वन,

लील गया आंगन का गुंजन।

लहरा बीच रजाई पाला,

मन को कँपा नचा तन डाला।

हड्डी अकड़ लकड़ बन बैठी,

आँतें शीत पकड़ कर ऐंठीं।

कूँ कूँ करते पिल्ली पिल्ला,

बुढ़ऊ कहते जाड़ा चिल्ला।

हमारीवाणी

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