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शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

शीत के शासन

शीत की रीति है प्रीति जमे वहीं आग जले गरमाई मिले यदि।
शून्य भई मति कम्पन अंग में  संग फले मनभाई मिले यदि।
स्वर्ग की चाह न मोक्ष का मोह न नेह उढ़ायी रजाई मिले यदि।
शुक्ल कहें सुख शीत के शासन अंक समायी लुगाई मिले यदि।

सोमवार, 1 जनवरी 2018

रविवार, 19 जनवरी 2014

शीत

उठा क्षितिज से कुहरे का दल,

लील गया सूरज का संबल।

लील गया घर खेत बाग वन,

लील गया आंगन का गुंजन।

लहरा बीच रजाई पाला,

मन को कँपा नचा तन डाला।

हड्डी अकड़ लकड़ बन बैठी,

आँतें शीत पकड़ कर ऐंठीं।

कूँ कूँ करते पिल्ली पिल्ला,

बुढ़ऊ कहते जाड़ा चिल्ला।

हमारीवाणी

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