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सोमवार, 17 मार्च 2014

होली में

बड़ी सुन्दर सजी चौपाल है इस साल होली में।
केसरिया रंगे मोदी से सजी है थाल होली में।
बने सरकार जिसकी भी न कोई फर्क है प्यारे।
मुझे अच्छा लगा हुड़दंगे केजरीवाल होली में ।
बहुत मायूस है बेटा बुझी सी दिख रही है माँ।
तिबारा है नहीं दिखती गलेगी दाल होली में।
जो नेता तीसरे मोर्चे की बातों में भ्रमाये हैं।
उसी घर जायेंगे जिस ओर हो तर माल होली में।
बुढ़ापे में लगाया रंग अन्ना ने वो दीदी को।
अंगूठा देखकर ममता हुई हैं लाल होली में।
लिए लालटेन को लालू टटोलति रास्ता आवें।
कहाँ फेकैं समझ आवै न अपना जाल होली में।
नहीं मैं बात माया की करूंगा इस समय कुछ भी।
बहाली तन से हाथी की है बदली चाल होली में।
मुलायम ने समझ रक्खा है पब्लिक को गधा उल्लू।
लगाई लाल को है डांट ढाई साल होली में।
बहुत ज्यादा नहीं कहना अरे वोटर सम्भल जाओ।
तुम्हारा वोट है तलवार कर दो काल होली में।
ये ई वी एम् है पिचकारी बहुत रंग के बटन इसमें।
जो रुचता हो करो रंगीन उसके गाल होली में।

रविवार, 30 अक्टूबर 2011

पंछी उड़ जा


इस पल दो दानों का लालच, फिर आजीवन पराधीनता।
पंछी उड़ जा पंछी उड़ जा पंछी उड़ जा पंछी उड़ जा,
उधर नीड़ में कोई तेरा पन्थ हेरता होगा।
मम्मी पापा कह कह कातर स्वरों टेरता होगा।
तेरे मुहँ में जो भोजन है क्या पर्याप्त न होगा।
यह दाने तो माया मृग हैं, ठीक नहीं है इधर लीनता।
पंछी उड़ जा पंछी उड़ जा पंछी उड़ जा पंछी उड़ जा|
सड़क
दूर क्षितिज पर जहाँ एकाकार है धरा और अम्बर, सड़क निज के समाप्त होने की प्रतीति देती है, किन्तु होती नहीं समाप्त।
ध्येय पर पहुँच कर भी बढ़ लेती है अन्यत्र किसी दूसरे ध्येय की ओर जिस पर चलने को आतुर होते हैं पथिक।
ऐसी ही किसी सड़क पर मैं तुम और सारा संसार गतिमान है।
चलते रहो यही जीवन का साधारण सा अंकगणित है।
जिसने समझा उसी ने विकास के प्रतिमान गढ़े।
बटमारों के प्रति
तुम भी कितने हो दीन मित्र, खाना पड़ता है छीन मित्र, सुनते न काल की बीन मित्र, मति से पैदल यश हीन मित्र।

हमारीवाणी

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