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शनिवार, 7 मई 2022

सिनेमा दिखउतीं

बियाहिन से गहिरी कुंवारी लगउतीं।
लिपिस्टिक ते होंठन की यारी दिखउतीं।।
न सिर पर दुपट्टा न सीना ढके हैं,
निलज तारिका सी सिनेमा दिखउतीं।।
न अम्मा न बप्पा न बहिनी न भैया,
सिरिफ दोस्तन संग रिश्ता निभउतीं।।
मुहब्बत का फीवर चढ़ा तन व मन पर,
अगर कुछ कहौ आधुनिकता बतउतीं।।
गजब वक्त के रंग अजबइ गजब हैं,
फिसलने को अपने तरक्की जतउतीं।।
तुम्हैं लगि रहो हम गलत कहि रहे हइं।
कहति हम तुम्हैं सबसे जादा सतउतीं।।

गुरुवार, 11 मार्च 2021

आग जला लेते हैं

चलो समोसे खा लेते हैं।
इस मन को बहला लेते हैं।
धूप नहीं आई है छत पर,
थोड़ी आग जला लेते हैं।
कहाँ अकेले जाकर घूमूँ,
सोचा तुम्हें बुला लेते हैं।
बहुत पुराना याराना है,
जब तब इसे निभा लेते हैं।
ज्यादातर पैदल चलकर हम,
पर्यावरण बचा लेते हैं।
सेहत है व्यापार हमारा,
जल में दूध मिला लेते हैं।
नाम हमारा छोटा सा है, 
तुझसे जोड़ बढ़ा लेते हैं।




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शनिवार, 31 मई 2014

रसमय मित्र

29/5/1993

किसी अंग्रेजी कविता की स्मृति आधारित भावाभिव्यक्ति--
रसमय मित्र

कितनी रसमय? मित्र ! मनोहर छवि है तेरी|

बस तू आशा किरण अन्य सब छाँव घनेरी|

शाम घिरे ही लौट गेह में तुम आते हो|

बड़े प्रेम से निज बच्चों संग कुछ गाते हो|

निश्चय ही यह प्रेम गीत है गाओ प्यारे|

कानों को अच्छा लगता है मित्र हमारे|

इतनी मिठास यह दर्द कहाँ से लाते हो|

मुझको भी दो जिस मीटर में तुम गाते हो|

मुझको भी अपने भावों का सहभागी कर लो|

इसी नीड़ में फिर चाहे इहलीला कर लो|

सिर्फ आखिरी साँस तुम्हारी मृदु लय टूटे|

सुनता रहूँ निरंतर मैं जब तक तन छूटे|

काश तुम्हारा गीत सभी जग वाले सुनते|

भौतिकता से दूर तुम्हारे रंग में रंगते|

@विमल कुमार शुक्ल'विमल'

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