गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

लोकतन्त्र की अर्थी निकली

घर में जो दरार दिखती है।
उस दरार में घर दिखता है।
झाड़ दुलत्ती बदल रहा दल,
अब नेता बहुत बिदकता है।
ऊँट कहाँ किस करवट बैठे,
बिलकुल पता नहीं चलता है।
आम सवेरे संध्या इमली,
रस बदला तो रस्ता बदली।
नेता लड़े लड़ी जनता पर,
लोकतन्त्र की अर्थी निकली।
दंगे हजम हजम घोटाले,
जनता के दिल में हैं छाले।
कुत्तों से उम्मीद नहीं है,
जनता ही कुछ सूत्र निकाले।

रविवार, 19 जनवरी 2014

बिको जाति है

गाँव से शहर गओ गोरी के प्रेम पगो,
बीबी का बताई गओ बिजनेस का जाति है।
रोज रोज फोन करि घर मा बताई देइ,
जल्दी लौटि अइबो कुछु सौदा रहो जाति है।
एक दिन जानि गई राजु सबु सौदा करो |
कौनु कामु करति मियाँ हियो फटो जाति है|
बीबी रही समझदार एक दिन बोली मियाँ,
जो तुम खरीदति हुआं हियाँ बिको जाति है।

शीत

उठा क्षितिज से कुहरे का दल,

लील गया सूरज का संबल।

लील गया घर खेत बाग वन,

लील गया आंगन का गुंजन।

लहरा बीच रजाई पाला,

मन को कँपा नचा तन डाला।

हड्डी अकड़ लकड़ बन बैठी,

आँतें शीत पकड़ कर ऐंठीं।

कूँ कूँ करते पिल्ली पिल्ला,

बुढ़ऊ कहते जाड़ा चिल्ला।

सोमवार, 11 नवंबर 2013

हमारीवाणी

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