तेरहवीं सदी से लेकर अठारहवीं सदी तक प्रायः एक भाषा अस्तित्व मध्य भारत में रही जो आमजन के द्वारा प्रयोग की जाती रही जिसमें क्षेत्रीयता का प्रभुत्व रहा या कहें प्राचीन भारतीय भाषाओँ के शब्द बहुलता से प्रयोग होते थे| जब यह भाषा मुस्लिम दरबारों में पहुँचती थी इसी में अरबी फारसी के शब्दों का घनत्व बढ़ जाता था| जब यही भाषा राजदरबारों से बाहर आयी तो एक अजब घालमेल हुआ एक ऐसी भाषा प्रचलन में आयी जिसके लिए नाम देना ही कठिन (सिर्फ मेरे विचार से)| जैसे ही अंग्रेज आये उन्होंने फूट डालनी प्रारम्भ की और वे इस भाषा के लिए दो नामों की धारणा लेकर आये| एक हिन्दी दूसरी उर्दू| जो देवनागरी लिपि में संस्कृतनिष्ठ लिखी गयी वह हिन्दी और जो फारसी लिपि में अरबीफारसीनिष्ठ लिखी गयी वह उर्दू| आपको देवकी नन्दन खत्री का उपन्यास 'चन्द्रकान्ता' याद होगा| जरा याद करो किस भाषा में है? कहते हैं कि वह हिन्दी के प्रथम तिलिस्मी उपन्यास कार थे| मैंने इस ग्रन्थ का कुछ अंश पढ़ा है अधिकांश उर्दू शब्दावली का प्रयोग है|
अंग्रेजों ने भले ही शिक्षा के क्षेत्र में अंग्रेजी को आगे बढ़ाया हो किन्तु मुझे आजतक समझ में नहीं आया कि क्यों अदालती काम काज आज भी उर्दू में होते हैं| अब धीरे धीरे भले ही लिखापढ़ी में हिन्दी प्रयोग में आ रही हो किन्तु फिर भी बहुत सा काम अभी भी उर्दू में ही होता है| थोड़े दिन पहले तक प्रशासनिक परीक्षा में अंग्रेजी का बोलबाला था| धीरे धीरे ही सही हिन्दी व दूसरी भारतीय भाषाओं के विद्यार्थी भी अब इन परीक्षाओं में बैठ पाते हैं|
मुझे बहुत बार ऐसा प्रतीत होता है कि उपरोक्त को ध्यान में रखें तो हिन्दी बिल्कुल नवीन भाषा है जो अपने विकास के लिए छटपटा रही है| आओ इसके विकास में हम भी अपना योगदान दें| जहाँ अनिवार्य न हो वहाँ हिन्दी का ही लिखने पढ़ने में प्रयोग करें| सामने वाले को हिन्दी के प्रयोग के लिए प्रोत्साहित करें|
