एक फेसबुकिया कवि की शिकायत थी पढ़ता नहीं कोई, तो उसके लिए सुझाव है:
यूँ लिखो पढ़ना पड़े।
सीढ़ियाँ चढ़ना पड़े।
ढोल सुन बारात का,
द्वार से कढ़ना पड़े।
फासला इतना रखो,
विवश हो बढ़ना पड़े।
मत लिखो जब यत्न कर,
काव्य को गढ़ना पड़े।
कर्णप्रिय स्वर के लिए,
ढोल को मढ़ना पड़े।
9198907871