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शुक्रवार, 26 अप्रैल 2024

विरह वेदना

ना पिय पाये न पायी पाती।
सावन माह जल रही छाती।
खेत खेत बिखरी हरियाली,
हृदय  मरुस्थल बिछुड़न व्याली।।1।।
तन तृण विरस ज्वलन हित तत्पर।
प्राण प्रयाण चाहते सत्वर।
दोनों अपनी गति पा जाते,
प्रिय दर्शन को ठहरे हठकर।।2।।
दुरभिसंधि है अनिल अनल की।
दिखे न पीड़ा उर में छलकी।
नयन नीर का कोष शून्य है,
पलकें चाह करें एक पल की।।3।।

मंगलवार, 4 जुलाई 2023

अबला-सबला

पलकों पर लाज का भार धरे धरती धँसे नैन कथा रचते।
हिय में जब नेह की ज्योति जले तब संशय रंच नहीं बचते।
अभिमान श्रृंगार का व्यर्थ प्रिये! उपमा-उपमान कहाँ जँचते?
जब प्रेम-प्रसून प्रसारें सुगन्ध सदा तब मन्मथ आ मचते।।1।।

अलकावलि अबला की सबला बलवान हुई उर आहत है।
गजरे के सुकोमल पुष्प छिपा अनुभूत करे कुछ राहत है।
यह नैन शरों क्षतविक्षत है पर सोंच यही कि अनाहत है।
लगे नागिन-वृन्द ये केश समूह न चिंत यहीं रहे चाहत है।।2।।

गुरुवार, 16 सितंबर 2021

कौन तुमको दूर अपने से करे

अंजुली में हैं सजाये सुमन अधरों से झरे।
नैन झिलमिल दीप हो मन को उजाले से भरे।
छवि तुम्हारी ओ प्रिये हरती सदा मन की थकन,
इस दशा में कौन तुमको दूर अपने से करे।
पूर्णिमा का चाँद सम्मुख हो रही साकार हो
स्वर्ग से उतरी परी का स्वर्णमय आकार हो
तुम हमारे सदन-उपवन-वन-विजन में बस गयी,
प्रात की पावन सुरभियुत पवन का व्यवहार हो।
तंत्रिकाएं हो गयीं झंकृत अजब अनुभूति से,
दश दिशाएं अमृत भरकर कलश निज कर में धरे।
इस दशा में कौन तुमको दूर अपने से करे।
काम है या मोह है या प्रेम है या वासना।
नेह का आनन्द है या बिछुड़ने की त्रासना।
कौन विश्लेषण करे या संश्लेषण मेंं जुटे,
कर रहा अव्यक्त की जैसे सतत आराधना।
जिस घड़ी से आ गया सानिध्य में तेरे प्रिये!
हो गया मैं पतन या उत्थान के भय से परे।
इस दशा में कौन तुमको दूर अपने से करे।

विमल 9198907871

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