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सोमवार, 13 जून 2022

लाजवाबी

गुलब्बो कहाँ तक गुलाबी रहेगी,
नजर से कहाँ तक शराबी रहेगी,
मगर नेह की अग्नि उर से उठी है,
जहाँ तक रहे लाजवाबी रहेगी।।1।।
गला ढल गया गुम हुआ है तरन्नुम,
अभी इल्तिजा गर मिले वो तबस्सुम, 
गुलब्बो समाँँ बाँध देगी जहाँ में, 
बना देगी जन्नत मिले जो जहन्नुम।।2।।
नोट-गुलब्बो प्रायः मेरी कविताओं का ऐसा काल्पनिक पात्र है जिसे मैं प्रेम करता हूँ।

गुरुवार, 10 जून 2021

अगले किसी मोड़ पर

ऐ! गुलब्बो,
ये तय है कि अगले किसी मोड़ पर मेरी तेरी राहें अलग हो जाएंगी। कुछ दूर तक एक दूसरे को शायद देखते भी रहें, किन्तु कहाँ तक? उसके बाद रहेंगी स्मृतियाँँ या वे भी नहीं। सौ वाट का बल्ब जलते ही पाँच वाट के बल्ब पर ध्यान कहाँ जाता है। फिर क्या प्रेम क्या घृणा दोनों को हृदय में रख पाना कठिन हो जाएगा। तो क्यों नहीं वर्तमान को मिठास से भर दें और घृणा का परिहास कर दें। अपने हृदय में झाँककर देखो और प्रेम तथा घृणा को पृथक पृथक पहचानने का यत्न करो। असफल हो गए न। जब प्रेम दिखता है तो घृणा नहीं और जब घृणा दिखाई दी तो प्रेम नहीं दिखाई दिया। क्यों? वास्तव में प्रेम और घृणा का पृथक पृथक अस्तित्व ही नहीं है। वे दोनों तो एक ही हैं। प्रेम और घृणा का एक एक कर दिखाई देना तो हमारी आँखों पर चढ़ी ऐनकों के कारण है। लाल गुलाब हरी ऐनक से बैंगनी दिखता है और पीली ऐनक से नारंगी। किन्तु गुलाब तो गुलाब ही है।
मैंने छोड़ दिया है तुममें भविष्य को देखना तुम भी छोड़ दो मुझमें अपने भविष्य को देखना। रेल की दो पटरियों की तरह साथ साथ होने का भ्रम मत पालो। दूर दूर रहकर भी जब तक साथ दिखाई पड़ रहे हैं तब तक स्लीपरों के सहारे टिके रहने का आनंद उठा लो। जैसे ही जंक्शन आयेगा दोनों का साहचर्य परिवर्तित हो जायेगा। फिर एक दूसरे के मार्ग की स्टेशनें पृथक हो जायेंगी।
तुम्हारा वर्तमान

गुरुवार, 14 मई 2020

मैं बिचारा



आज फिर मेरी गुलब्बो मिल गयी बाजार में,
हो गयी ज्यादा निपुण अब प्रेम के व्यापार में,
माँगती थी मौन होकर आज फिर से चार पल,
दे दिए थे एक दिन उसने मेरी मनुहार में||

मनुहार























मैं बिचारा फँस गया चक्की के दोनों पाट में,
थी गुलबिया साथ में आई गुलब्बो बाट में,
किस तरह चीजें बदलतीं मैं बखूबी जानता हूँ,
घुस गया है चोर कोई विश्व के सम्राट में||
गुलबिया-गुलब्बो

 
















कृपया पोस्ट पर कमेन्ट करके अवश्य प्रोत्साहित करें|

मंगलवार, 16 मई 2017

नया पाठ

16/05/2017
मुहब्बत भरी शायरी लिख रहा हूँ।
स्व जीवन की नव डायरी लिख रहा हूँ।
जो पन्ने पुराने लगे ही रहेंगे,
नया हुस्न कारीगरी लिख रहा हूँ।।1।।
नया पाठ नामे गुलब्बो बढ़ाया।
बुढ़ापे से यौवन में फिर लौट आया।
खुदा की कसम राम के नाम से ली,
मरुथल में सागर से मैं खेल पाया।।2।।
गये जेठ आषाढ़ आया हो जैसे।
प्रकृति ने फिर प्राण पाया हो जैसे।
तड़प दिल में ऐसी कि बिच्छू डसा हो,
कहीं कोबरा काट खाया हो जैसे।।3।।
©विमल कुमार शुक्ल'विमल'

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