गुलब्बो कहाँ तक गुलाबी रहेगी,
नजर से कहाँ तक शराबी रहेगी,
मगर नेह की अग्नि उर से उठी है,
जहाँ तक रहे लाजवाबी रहेगी।।1।।
गला ढल गया गुम हुआ है तरन्नुम,
अभी इल्तिजा गर मिले वो तबस्सुम,
गुलब्बो समाँँ बाँध देगी जहाँ में,
बना देगी जन्नत मिले जो जहन्नुम।।2।।
नोट-गुलब्बो प्रायः मेरी कविताओं का ऐसा काल्पनिक पात्र है जिसे मैं प्रेम करता हूँ।

