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गुरुवार, 12 अगस्त 2021

आरक्षण

हर जन की गणना करवा आरक्षित कर दो चारा।
अस्पताल श्मशान रेलवे खेल सिनेमा कारा।
कौन जाति के कितने भैया कौन सड़क से जायें।
अखबारों में एक सूचना रोज सुबह छपवायें।
कौन जाति वालों को कितनी पानी हवा मिलेगी।
अमुक जाति का पिसना आये चक्की तभी चलेगी।
जब तक कोटे भर मरीज हों नहीं किसी क्लीनिक में।
तब तक डॉक्टर रहे लापता दिखे नहीं क्लीनिक में।
एफबी पर कमेंट की खातिर असली आरक्षण हो।
पहले अपनी जाति बताये तभी पोस्ट लाइक हो।

शनिवार, 13 जून 2020

कोई था शुक्ला

सोंचता हूँ एक कबाड़ साहित्यिक अंतराष्ट्रीय संस्था मैं भी बना डालूँ, स्वंभू कवि, कवि नहीं आशुकवि, आशुकवि नहीं कविराज, नहीं नहीं कविराय अपने लिए नाम के आगे पीछे कुछ लगना चाहिए कि नहीं। स्वयं भू संस्था बनाऊँ और उसका सर्वे सर्वा  बनूँ। खुद तो कुछ लिख पाता नहीं, न मूल्यांकन ही आता है, बस प्रमाण पत्र ही तो बांटना है कम्प्यूटर पर एक चित्र बनाना है उस पर कविवर का नाम टीपना है और बन गया सम्मान पत्र। कवि खुश, कविता निराश है हुआ करे। लोगों के दिल की भड़ास निकल जाती है कुछ लाइक कुछ कमेंट और हो गए हम ग़ालिब के परबाबा और तुलसी के परपोते। जब हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखा जाएगा इतनी सारी संस्थाओं में मेरी वाली कहाँ होगी क्या लेना देना, किन्तु होगी तो कहीं इसका सन्तोष रहेगा। कितनी बेइज्जती होगी यार जब लोग कहेंगे यार वो एक था अयारवी या पिहानवी कोई नाम याद नहीं आ रहा वो कोई शुक्ला था कभी कभार सुना है कुछ लिखता था कैसे सहन करूँगा हाँ कम्प्यूटर पर थोड़ी मेहनत हो जाए तो काम बने। लोग याद करेंगे लिखता तो बेकार था किंतु पुरस्कार बाँटकर मुझे अमर कर गया।
अब करूं क्या अपना तो हाल यह है अजगर करे न चाकरी, आगे क्या लिखूँ आप समझदार हैं तभी तो कोई कविता पूरी नहीं कोई किताब पूरी नहीं। साहित्य के पास नहीं साहित्य से दूरी नहीं।  

रविवार, 26 मई 2019

पांडे जी का बेटा

आज पांडे जी के बेटे से मुलाकात हो गई, बेचारा बहुत परेशान है इन दिनों। गर्लफ्रेंड तो गर्लफ्रेंड बहन भौजाइयाँ सभी कन्नी काट के निकल जाते हैं और बीबी शक की नजर से देखती है सो अलग। ऐसा हो भी क्यों न जब खुले आम उसके मुँह से कहलवाया जा रहा है, "पांडे जी का बेटा हूँ, चिपक के चुम्मा लेता हूँ।"
अजी ये भी कोई बात हुई सीधे सीधे पांडे जी के बेटे का चरित्र चित्रण कर रहे हो और मजे ले रहे हो। असली मजा तो तब आता है जब आपको ये पता चलता है कि इस गाने से प्रभावित होकर किसी और का लड़का आपकी लड़की को चिपककर चुम्मा ले लेता है और आप मुँह छुपाते फिरते हो। अरे भाई शादी ब्याह का मनोरंजन अपनी जगह, अभिव्यक्ति की आजादी अपनी जगह, और जाति वर्ग का चरित्र चित्रण अपनी जगह। हम तो ठहरे ब्राह्मण सुन लेते हैं उल्लुओं की बातें भी। अभी कुछ दिनों पहले लोग पहुँच गए थे कोर्ट में बाबा तुलसीदास को लेकर कि कुछ चौपाइयाँ वर्ण व्यवस्था के सम्बंध में आपत्तिजनक हैं, उन्हें श्रीरामचरितमानस से निकाल दिया जाए। पता नहीं निकाली गईं या नहीं। वह तो रही पाँच सौ वर्ष पहले की बात, किन्तु यह मामला ताजा है। पांडे जी का बेटा बहुत भला है वह यूँ ही किसी को चिपककर चुम्मा नहीं लेगा, यह भलमनसाहत उसे अपने बाप से मिली है। देखो सबूत मत माँगो क्या इतना काफी नहीं है कि पांडे जी ने गाना लिखने, गाने, रिकॉर्ड करने व बजाने वाले का बैंड नहीं बजाया। और तो और कहीं आपत्ति तक दर्ज नहीं कराई।
अब मैं इतना क्यों लिख गया? तो भाई मैं शुक्ला हूँ और पांडे जी का बेटा मेरा भी कुछ लगता है मुझे उससे सहानुभूति है। मुझे अमिताभ बच्चन अभिनीत वह गाना याद आता है,"मुहल्ले वालों अपनी मुर्गी सम्भालो मेरा मुर्गा जवान हो गया।" कहीं वाकई पांडे जी का बेटा अपनी पर आ गया और चिपक के चुम्मा लेने लगा तो पता नहीं किस किस को अपनी अपनी बेटियाँ सम्भालनी पड़ जायेंगी।

कृपया पोस्ट पर कमेन्ट करके अवश्य प्रोत्साहित करें|

मंगलवार, 14 नवंबर 2017

सियासत



बात जब करो शराफ़त से करो।
जब न सुने तो लियाकत से करो।
बात सब सुन लेंगे तुम्हारी मित्रों,
घुमा फिरा के करो, सियासत से करो।।

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