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सोमवार, 3 जून 2019

प्रेम

एक अनकही अकविता

प्रेम,
बात ही न करो,
कभी किया नहीं।
हृदय की संसद,
सत्र दर सत्र,
बजट पास हुआ नहीं।
हताश हुआ नहीं।
प्रेम,
आज भी,
जेहन में है।
जमीन से,
दूर बहुत दूर।
प्रेम,
शिखर से उतरा,
खोह में विलीन हुआ।
मैं और रेगिस्तान,
अपनी जगह पर हैं।
प्रेम,
अब स्वप्न है,
जागूँगा,
टूट जायेगा।

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रविवार, 30 दिसंबर 2012

बड़ा प्रश्न



एक मधु सी मुस्कुराहट और रेगिस्तान,
कुछ
सिमटते जख्म कुछ बाकी निशान,
एक
हकीकत सा मगर सब स्वप्न है,
जीवन
मृत्यु से बड़ा प्रश्न है।

हमारीवाणी

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