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शनिवार, 30 जनवरी 2021

महात्मा गाँधी और किसान

आज महात्मा गाँधी जी की पुण्यतिथि है। मेरे लिए कोई विशिष्ट महत्व निजी तौर पर तो नहीं है। किन्तु अभी 26 जनवरी को जो लालकिले पर हुआ और जिस तरह से पुलिस ने मामले का सामना किया तो एकबारगी गाँधी जी मेरे लिए महत्वपूर्ण हो गए। 
मैं टीवी पर विभिन्न चैनलों के माध्यम से जो लाइव टेलीकॉस्ट देख रहा था तो लग रहा था कि दो चार तो जरूर लाठी डण्डों की चोट से मरे मराये होंगे। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि भारतीय पुलिस अभी भी गाँधीवादी हो सकती है।  कोई शातिर पूछ रहा था कि पुलिस क्या कर रही थी, गुण्डे लालकिले तक पहुँच गए। वास्तव में जो यह शातिर चाहता था वह पुलिस ने नहीं किया अस्तु पुलिस को साधुवाद। वरना जो शातिर यह पूछ रहा था कि पुलिस क्या कर रही थी वही शातिर लालकिले के बाहर तिरंगा उतार कर अन्य ध्वज फहराने वाले की लाश पर घड़ियाली आँसू बहाते हुए सरकार व पुलिस से यह सवाल कर रहा होता कि अपना हक माँगने की सजा पिछवाड़े पर गोली। 
कोई ऐंकर भी टीवी पर चिल्लाता देखो देखो यह नमो सरकार का किसान विरोधी चेहरा। एक बेकसूर देश भर के किसानों के हक के लिए शहीद हो गया। 
राकेश टिकैत के जो आँसू टपके वो सैलाब बन गए होते। नहीं हुआ ऐसा। किसे धन्यवाद दूँ, पुलिस को। नहीं पुलिस तो वही करती है जो उसे आदेश होता है। सत्ता पक्ष के इशारे पर आग उगलती है तो चूड़ियाँ भी पहन लेती है। क्या आदेश था राम जाने। काश आज गाँधी जी होते तो लालकिले पर अन्य झण्डे के फहरते और हिंसा फैलते देखते तो कहते जो हुआ उसकी नैतिक जिम्मेदारी लेता हूँ और असहयोग आंदोलन की तरह यह आंदोलन भी स्थगित करता हूँ।

हमारीवाणी

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