१५/१२/१९९७
ओ! मील के पत्थर तुम्हें मेरा नमन।
पत्थर नहीं तुम हो गतागत ज्ञान दाता।
है प्रीत जिसको लक्ष्य से वह जान पाता।
किस दिशा में और कितना है गमन।
ओ! मील के पत्थर तुम्हें मेरा नमन।
पथ की महत्ता मूक होकर भी बताते।
भटके हुओं को मार्ग पर भी तुम लगाते।
और करवाते वियुक्तों का मिलन।
ओ! मील के पत्थर तुम्हें मेरा नमन।
पथ पर चला जो करके अनदेखी तुम्हारी।
उसने कदाचित ही स्वयँ की गति संवारी।
प्राप्त कर पाया सफलता की शरण।
ओ! मील के पत्थर तुम्हें मेरा नमन।
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