पुस्तक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
पुस्तक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

मैं कृष्णा हूँ



कृष्णा का तात्पर्य है ‘काली’ कृष्णा नाम है द्रौपदी का और भला हो नाशपीटे अँग्रेजी दाँ लोगों का जिन्हें हिन्दी नहीं आती उन्होंने कृष्ण को भी कृष्णा कर दिया जैसे गणेश का गणेशा, महेश का महेशा, राम को रामा, वेद को वेदा और योग को योगा इत्यादि। इन अँग्रेजी दाँ लोगों को कैसे समझायें कि हिन्दी में शब्द अभिव्यक्ति का साधन मात्र नहीं है अपितु इसे ब्रह्म की सँज्ञा प्राप्त है। कवि एवं लेखक शब्दों से भाव सम्प्रेषण नहीं करते अपितु साहित्य साधना करते हैं। अस्तु अति उत्तम होगा यदि कृष्णा सहित अनेक हिन्दी शब्दों को उन्हें हिन्दी के स्वरूप में ही समझा जाये।
यहाँ ‘मैं कृष्णा हूँ’ का तात्पर्य डॉ० अनन्त राम मिश्र विरचित प्रबन्ध काव्य से है। इसमें दक्षिण भारत की जीवन रेखा कृष्णा नाम नदी के इतिहास, भूगोल, वैभव व महत्त्व को मिश्र जी ने अपने काव्य कौशल द्वारा प्रस्तुत किया है। आत्मकथात्मक शैली में एक उदघोषिका की तरह स्वयं अपना सम्पूर्ण परिचय प्रस्तुत कर रही है।
तमिल तथा हिन्दी की प्रख्यात लेखिका सरस्वती रामनाथ को समर्पित यह काव्य वास्तव में उत्तर व दक्षिण को एक साथ खड़ा करने का स्तुत्य प्रयास है। महाराष्ट्र, आन्ध्रप्रदेश तथा कर्नाटक को जीवनामृत  वितरित करती हुई कृष्णा स्वयं में किसी काव्यधारा से कम नहीं है। यह पुस्तक मात्र ७९ पृष्ठों के विस्तार मे छः सर्गों में विभक्त होकर किसी भी भीमकाय प्रबन्ध काव्य से अधिक ही प्रभवित करती है।
प्रथम सर्ग में सह्याद्रि पर्वत का भौगोलिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक सौन्दर्य सह्याद्रि के मुखारविन्द से ही उच्चारित है। अज के द्वारा किये गये यज्ञ और उस यज्ञ में सरस्वती का क्रोध और उनके द्वारा दिये गये शाप के परिणाम्स्वरूप काकुमती, वेण्या और कृष्णा के रूप में त्रिदेवों का पृथ्वी पर उपस्थित होना रोचक व मनोहारी ढँग से प्रस्तुत है।
सह्याद्रि की पुत्री के रूप में कृष्णा का आरोपण और सह्याद्रि के द्वारा कृष्णा के सिन्धु मिलन पर  चिन्तित होना व बेटी को उपदेश देना और कृष्णा के द्वारा सह्याद्रि को अपनी कुशल बताना मानवीकरण अलंकार के साथ साथ एक भारतीय पिता-पुत्री के सम्बन्धों का हृदयस्पर्शी चित्रण है।
उदाहरण दृष्टव्य है-
क्योंकि उदधि के अन्तःपुर में भीड़ लगी है दाराओं की-
मेरी पुत्री पर न, वहाँ जा छाया पड़े वँचनाओं की।
...............................................................................................................
...............................................................................................................
यही सोंचकर बार-बार मैं सुता विष्णुजा को समझाता।
उस स्वयंवरा को पत्नी के धर्म कर्म का मर्म बताता।
कृष्णा नाम द्वितीय सर्ग में कृष्णा के मुखारविन्द से उसके उदगम स्थल से लेकर भीमा से मिलन तक की कथा प्रस्फुटित है। साथ में मराठा स्वभिमान की गाथा भी। समर्थ गुरु रामदास, छत्रपति शिवाजी और ताराबाई आदि की गौरव गाथाओं का स्मरण कराती हुई अपने मार्ग की विशेषताओं, तटीय नगरों व नागरिक जीवन की झाँकी भी कृष्णा ने प्रस्तुत की है।
कवि प्राकृतिक सौन्दर्य, इतिहास व भूगोल के साथ साथ अर्थशास्त्र को भी याद रखता है और श्रम तथा पूँजी के वाँछनीय सम्बन्धों पर किस प्रकार प्रकाश डालता है दो पँक्तियों में देखें-
जिस दिन पूँजी हो उदार, श्रम की अर्चना करेगी।
उस दिन से जगती, अपूर्व समता सुख में विचरेगी।
तृतीय सर्ग में भीमा नदी अपने मुख से अपना परिचय कृष्णा को प्रस्तुत करते हुए त्रिपुर वधोपरान्त शिव के सह्याद्रि पर आगमन तथा उनके द्वारा भीमक भूप को दिये गये वरदान के अनुसार अपनी उतपत्ति की कथा वाँचती है। इस सर्ग में प्रयोज्य छ्न्द को लेकर दो पँक्तियाँ मनोमस्तिष्क में घूम रही हैं जिन्हें यहाँ लिखने का लोभ सँवरण नहीं कर पा रहा हूँ-
पँक्तियों में वर्णित सौन्दर्य,
छन्द इसका सुन्दर सम्पुष्ट,
शब्द में भाव व्यंजना सहज,
पाठकों को करती सन्तुष्ट।
चतुर्थ सर्ग में ’करनूल’ नामक स्थान पर संगमित तुँगभद्रा कृष्णा को अपने इतिहास के साथ साथ यह भी बताती है कि वेदों के पठन पाठन व संरक्षण की जैसी परम्परा दक्षिण भारत में प्राप्य है वैसी उत्तर भारत में नहीं। पुस्तक में वर्णित यह पँक्तियाँ वेद व शास्त्रों के पठन पाठन की उपेक्षा करने वाले ब्राह्मणों की आँखें खोल देने के लिये पर्याप्त होनी चाहिये।
यहाँ पता चलता है कि तुँग और भद्रा दो नदियाँ हैं जो १२० मील अलग अलग बहकर ’कूडली’ के निकट संगम रचती हैं। ‘श्रृंगेरी मठ’ जहाँ आद्य शंकराचार्य ने दर्शन की अलख जगाई इसी नदी के तट पर है।
पँचम सर्ग में दक्षिण के कैलास "श्रीशैलम" का मनभावन और आह्लादक वर्णन करते हुए कृष्णा ने अपनी तुलना नल्लमलै की पहाड़ियों से निम्नलिखित पंक्तियों में की है-
मेरे जीवन में जितनी गहराई है-
इन शिखरों में उतनी ही ऊँचाई है।
मुझमें जितनी कोमलता गतिवत्ता है,
उतनी कठोरता इनमें जड़वत्ता है।
मैं सिन्धुदेव की ओर निरन्तर बढ़ती,
इनकी भी उत्सुक दृष्टि व्योम को पढ़ती-
मैं सरल और हूँ तरल धरापर रहती,
ये कठिन-सघन कर रहे साधना महती।
सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने वाली निम्नलिखित पंक्तियाँ भी अति सुन्दर हैं। वर्तमान में ऐसे साहित्य सृजन की महती आवश्यकता व उपादेयता है।
विख्यात मल्लिकार्जुन का जो मन्दिर है-
वह जाति भेद से परे समत्व मिहिर है।
हरिजन सवर्ण कोई भी जा सकता है-
इसमें प्रभु के प्रिय दर्शन पा सकता है।
जैसे मुझमें कोई भी कहीं नहाये-
अर्चना करे माँगे इच्छित फल पाये।
वैषम्य भावना कभी न अपनाती मैं-
मानव ही क्या? खग मृग तक दुलराती मैं।
अन्तिम व षष्ठम सर्ग में कृष्णा के द्वारा समुद्रदेव का गुणगान और उसमें कृष्णा का विलय भारतीय दर्शन की समन्वयवादी व विलयवादी भावना से ओतप्रोत है। अपने लघु कलेवर में विराट उद्देश्य की पूर्ति में डॉ० अनन्तराम मिश्र जी निश्चय ही सफल हुए हैं।
पृथक पृथक छन्दों में रचित यह पुस्तक गागर में सागर की कहावत को चरितार्थ करती है। हिन्दी में भारतवर्ष की नदियों को लक्ष्य बनाकर डॉ० साहब ने जो प्रंशसनीय कार्य किया है हिन्दी जगत उनका सदैव ऋणी रहेगा। नदियों को केन्द्र बनाकर जो रचनायें डॉ० अनन्त जी के द्वारा सृजित की गयी हैं वे साहित्य प्रेमियों के साथ साथ भूगोल, इतिहास, संस्कृति, कला और पर्यटन आदि के जिज्ञासुओं के लिये भी पठनीय, प्रँशसनीय व संग्रह्णीय हैं इसमें संशय नहीं है।

मंगलवार, 11 सितंबर 2012

"पंच गंगा"


’जिन खोजा तिन पाइंया गहरे पानी पैठ’ इस उक्ति का सत्यार्थ खोजना हो तो डॉ० अनन्त राम मिश्र ’अनन्त’ की ’पंचगंगा’ अवश्य पढ़नी चाहिये। छोटी काशी के नाम से जगत ख्यात गोला गोकर्णनाथ खीरी में रहते हुए अपने अथक परिश्रम से देश की विभिन्न जीवनदायिनी प्राणस्रोतस नदियों के सन्दर्भ में जिस काव्यात्मक ढंग से प्रस्तुतिकरण दिया है वह अनमोल,  प्रसंशनीय, पठनीय व संग्रहणीय है।
जून २०१२ में मेरा गोला जाना हुआ भोलेबाबा के दर्शन करने के लिये तो मेरी इच्छा हुई कि बड़े भाई तुल्य अनन्त जी के भी दर्शन कर लिये जायें। मैं उनके निवास पर पहुँचा। जहाँ मुझे उनकी कुछ कृतियाँ उपहार स्वरूप प्राप्त हुईं। जिनमें डॉ० साहब की "पंच गंगा" विशेष रही। यह पुस्तक उत्तर व दक्षिण की पाँच नदियों पर प्रकाश डालता हुआ एक प्रबन्ध काव्य है किन्तु यह इस अर्थ में विशिष्ट है कि पढ़ते हुये प्रबन्ध काव्य और खण्ड काव्य का आनन्द एक साथ देती है। इस काव्य में ताम्रपर्णी, शिप्रा, चर्मण्वती(चम्बल), ब्रह्मपुत्र तथा जय जाह्न्वी नदियों की अवसरानुकूल भिन्न-भिन्न छन्दों में उत्पत्ति,प्रवाह,गति, महत्व आदि पर प्रकाश डाला गया है।
जाह्नवी की दुर्दशा से कवि चिंतित होकर कह उठता है-

महानगर अति औद्योगिक स्वार्थान्ध हुए मतवाले-
नहीं विमल पुष्पांजलि तुझमें छोड़े गन्दे नाले।
प्रबल प्रदूषण-ग्रस्त, शुद्ध कब तक जलराशि रहेगी?
कालिय-द्वारा यमुना-सी तू हो गरलाक्त बहेगी।
फूल चिता के, सिक्के ताँबे के डाले जाते थे-
तुझमें जो रवि-कर-संसर्गित, परिशोधन लाते थे।
किन्तु कहाँ अब रहीं ताम्र मुद्रायें प्रचलन में?
कागज-लोहा चढ़ा रहे हैं जन तेरे जीवन में।
गंगावतरण की कथा को मानव जीवन पर रूपायित करते हुए कवि ने गंगा की आध्यात्मिक महत्ता को अपने निम्नलिखित पदों में प्रशंसनीय ढंग से व्याख्यायित किया है।
जगत-सगर-शासन में रहते साठ हजार प्रजाजन-
अश्वमेध का अनुष्ठान होता है मन का नियमन।
इन्द्र विषय-प्रेरक, मन-हय का हरण किया करता है-
लुब्ध पुरुष जिसका अनुपल अनुसरण किया करता है।(मेरी समझ से अनुपल की जगह प्रतिपल होना चाहिये)
कपिल-काल के अग्निल लोचन भस्म उन्हें करते हैं-
जो अति इन्द्रिय-लम्पट, धर्माचरण नहीं वरते हैं।
तपोनिष्ठ जिज्ञासु शिष्य ही भूप भगीरथ होता-
जो साधना भूमि-हिमगिरि पर तपकर अवितथ होता।

यदि भूगोल, इतिहास, संस्कृति और सभ्यता की अंतरंगता देखनी है तो इस पुस्तक में गंगा के हिमालय से बंगाल तक के गमन पथ के वर्णन का रसास्वादन अवश्य करना चाहिये।
राजनीति, साहित्य, कला, आध्यात्म, गीत, संगीत, नगर, गाँव, खेत, खलिहान, तीर्थ और रमणीय उपवन सभी कुछ तो सिमट गया है इस वर्णन में।
ताम्रपर्णी की उत्पत्ति की कथा अत्यधिक रोचक ढँग से प्रस्तुत की गई है। शिव-विवाह, शिव द्वारा अगस्त्य को दक्षिण में जाने की आज्ञा देना, अगस्त्य का दक्षिण की ओर जाना, विन्ध्यवासियों में सद्जीवन की अलख जगाना, विन्ध्याचल होकर उत्तर-दक्षिण वासियों का आवागमन सुलभ बनाना, राक्षसों को पराजित करना और मलयाचल की शोभा का वर्णन करना आदि प्रसंगों की कवि के द्वारा मनोहारी ढँग से इस रचना में प्रस्तुति की गयी है।
कवि केवल घट्ना क्रम के प्रस्तुतीकरण में ही अपनी दक्षता को सिद्ध करने में समर्थ नहीं है अपितु जीवन दर्शन के भी प्रस्तुतीकरण में भी समर्थ है। निम्नलिखित पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं।
वह मानव भी क्या मानव है? जो संकट से खेला न कभी।
दुख के प्रचण्ड आघातों को हँसते-हँसते झेला न कभी।
वह जीवन भी क्या जीवन है? जिसमें न प्रगति हो, धार न हो,
वह यौवन भी क्या यौवन? जो जाज्वल्यमान अंगार न हो।
श्वानों, शूकरों, शृगालों-सा, खाकर-सोकर मर जाना क्या?
जो रच न प्रगति-प्रतिमान सका, उसका रोना क्या? गाना क्या?
धुँधुआते निष्क्रिय वर्षों से, पल एक धधकता अच्छा है।
बहुसँख्य गरजते मेघों से, घन एक बरसता अच्छा है।
डॉ० अनन्त राम मिश्र ’अनन्त’ नाम है एक ऐसी प्रतिभा का जिन्होंने न केवल "पँचगंगा’ में उपरोक्त वर्णित नदियों पर काव्यसृजन किया है अपितु उन्होंने ’नर्मदा’, सरयू’ और ’मैं कृष्णा हूँ’ नाम से भी काव्य सर्जना की है जो प्रकाशित हैं किन्तु गोदावरी और कावेरी नदियों से सम्बन्धित नदी काव्य भी प्रकाशन के लिये प्रतीक्षारत है। सामूहिक रूप से उनकी नदी काव्य से सम्बन्धित सभी पुस्तकों को समाहित करते हुए "गंगायन" नाम से एक नवीन पुस्तक प्रेस में है। अनेकानेक विद्वानों ने नदियों से सम्बन्धित विभिन्न रचनायें पृथक-पृथक ढंग से लिखी हैं किन्तु डॉ० मिश्र जी ने भारत भूमि की नदियों पर सामूहिक रूप से जो अथक काव्य सर्जन किया है उसके लिये साधुवाद के पात्र हैं और मेरे जैसे नवोदित रचनाकारों के लिये आदर्श भी।


लेखक की इस ब्लॉग पर पोस्ट सामग्री और अन्य लेखन कार्य को पुस्तक का आकार देने के इच्छुक प्रकाशक निम्नलिखित ईमेल पतों पर सम्पर्क कर सकते हैं।
vkshuklapihani@gmail.com
vimalshukla14@yahoo.in

हमारीवाणी

www.hamarivani.com
www.blogvarta.com