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रविवार, 23 अगस्त 2020

घन घने








हम धरा की प्यास हरने आ गये हैं।
कृषकजन-संत्रास हरने आ गये हैं।
भर लिये हैं सागरों से कोष अपने,
नभ चढ़े परिहास करने आ गये हैं।
घन घने हम, गहन उर में ले रहस्य,
जगत में उल्लास भरने आ गये हैं।
वन, भवन, पथ, रथ, उदधि, नग,
हर किसी में श्वास धरने आ गये हैं।








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