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शुक्रवार, 25 मई 2018

दो दो जेठ



4/05/2018
हम तो एक से ही परेशान थे।
अब तो दो दो जेठ आ गये।
बादल कहाँ हैं? घूँघट कर लूँ।
फिर पिया की याद के झोंके सता गये।।
उसके पास होने का अहसास,
तपती दोपहर जिया जुड़ा जाता है।
जेठ या देवर, चिन्ता नहीं होती,
सारा रंज और भय उड़ा जाता है।।
घर बड़ा फिर मैं अकेला खोज हारा,
बिन पिया के मिल न पाया है सहारा।
आ भी जा अब मेघ के सँग या पवन सँग,
तृषित आँगन, तृषित यौवन तृषित अँग-अँग।।
 


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