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शनिवार, 2 दिसंबर 2017

मत रक्खो



अपनी तशरीफ इधर मत रक्खो।
मेरी है चीज नजर मत रक्खो।।
तेरी बातों  में बड़ी फिसलन है,
मेरी राहों में बटर मत रक्खो।।
तेरी नजरों की धार काफी है,
मेरी गर्दन पे कटर मत रक्खो।।
तेरे खत से मेरा घर काँपता है,
उसके अंदर वे जिकर मत रक्खो।।
वक्त हर वक्त पलट सकता है,
काँप जाये वो जिगर मत रक्खो।।
सौंप तो दी तुम्हें गुल्लक अपनी,
मेरा क्या होगा फिकर मत रक्खो।।

बुधवार, 24 मई 2017

गजल- कोई तो हमको चाहिए



मुझसे कह इस वक्त अब कहीं और जाने के लिए।
कंधा किसी का मिल गया सिर को टिकाने के लिए।
वो लोग पत्थर हाथ में लेकर मिलेंगे हर जगह,
घर में नहीं है पेट भर कुछ भी पकाने के लिए।।
सब लोग शादी में कहाँ चेहरा दिखाने आएँगे?
कोई तो हमको चाहिए घर भी बचाने के लिए।।
सब देखसुन खा पी के जब ये जिन्दगी हो घाट पर,
तब आंत में बस चाहिए तन मन झुलाने के लिए।।
यूँ तो सभी के हाथ दिखतीं एक जैसी लाइनें।
फिर भी तो अन्तर खोजिये मन को मनाने के लिए।।
नववस्त्र भूषण भूषिता निज मन मुकुर की अप्सरा।
सबको कहाँ मिल पाएगी उर से लगाने के लिए।।
जब पल्लवों ने साथ छोड़ा टहनियाँ नीरस हुईं।
कोई तो ही जाएगा आरा चलाने के लिए।।
व्याकुल नहीं मन में 'विमल' है देखकर जग का चरित।
सारे मशाले चाहिए भोजन बनाने के लिए।।

गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

पेपर

सामने घर है,
घर में खिड़की है,
खिड़की के पार दिखती है
एक मेज।
मेज पर पन्ने हैं,
दबे हैं
पेपर वेट के तले,
जब उड़ते हैं
मैं समझता हूँ
हो गया है
विद्युत् विभाग का उपकार।
उफ़ पेपर उड़ रहे हैं।
आदमी झल रहा है
हाथ से पंखा
और एक असफल प्रयास।
दबती नहीं है सफोकेशन।
©विमल कुमार शुक्ल'विमल'

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