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गुरुवार, 29 दिसंबर 2022

शिल्प का अनुराग

नई कविता के प्रवाह में भ्रमित त्रुटिपूर्ण गद्य लेखन कर उसे कविता का रँग प्रदान करने वाले स्वनामधन्य मनीषियों के लिए। आत्मावलोकन करें और परिमार्जन करें। अन्यथा आपकी रचना पढ़कर मैं अथवा अन्य आपकी रचना पर चाहे जैसी प्रसंशात्मक टिप्पणी चेंप दें किन्तु निर्मम समय आपको किनारे कर आगे बढ़ लेगा। आप जुगाड़ से पाठ्यक्रम आदि में स्थान प्राप्त कर लें और परीक्षार्थी अच्छे अंकों की अभिलाषा में अनमने चित्त से आपको रट भले लें। हृदय का सम्राट होने के लिए हृदयग्राही रचना होगा। 

आप यदि पूजा करें पथ नाग पाकर।
तृप्त हों वे रक्तबिन्दु-पराग पाकर।।
यज्ञ सारे ही हुए निज तृप्ति के हित,
देवता भी तृप्त हों निज भाग पाकर।।
यूँ बसंती सुरभि कम मादक नहीं है
किन्तु मस्ती बहुगुणित हो फाग पाकर।।
मानता हूँ पुष्टि होती अन्न में ही,
किन्तु बढ़ता स्वाद थोड़ी आग पाकर।।
मात्र आटा मत बिखेरो भूमि तल पर,
चौक पुरती है कला का पाग पाकर।।
भाव अन्तःकरण में जो जन्मते हैं।
खिलखिलाते शिल्प का अनुराग पाकर।।

कृपया पोस्ट पर कमेन्ट करके अवश्य प्रोत्साहित करें|

बुधवार, 23 जून 2021

कवि की मौलिकता

मेरे एक मित्र का  प्रश्न था , "बंधु क्या कोई भी कवि मौलिक रहा, है या होगा?" मैंने जो उत्तर लिखा शायद वह आपके मतलब का हो।

मौलिक तो केवल ईश्वर है। कविता के सन्दर्भ में मौलिक होना अलग बात है। कविता के दो पक्ष हैं भाव पक्ष और कला पक्ष। कोई कवि अपने अनुभवजन्य हृदयोदगारों को अपने ढंग से प्रस्तुत करता है तो वह मौलिक ही माना जाता है। नये बिम्ब व नवीन उदाहरण का प्रयोग भी मौलिकता की श्रेणी में आता है। होता क्या है जब से फेसबुक आया है और उससे पहले भी लोग दूसरों की कविता अपनी बताकर ज्यों की त्यों सुना देते थे और छोटे समाचार पत्रों इत्यादि में छपवा तक देते थे। जब तब बेइज्जत भी होते थे।
आजकल भी फेसबुक पर कोई अच्छी सी कविता को मिनटों में तमाम कवि अपनी बता  देते हैं। कुछ होशियार किस्म के चोट्टे आजकल शब्दों में थोड़ी बहुत छेड़छाड़ कर कुछ नये शब्द जोड़कर दूसरों की कविता को अपनी बना लेते हैं। छन्द को स्वच्छंद कर कीचड़ से कलाकन्द हो जाने का भ्रम पाल लेते हैं। ऐसी कविता फेसबुक पर लाइक और कमेन्ट की संख्या बढ़ा सकती है किन्तु उसे कितने समय तक लोग याद रखेंगे भगवान ही जानता है। समय की कसौटी पर ऐसे कवि कवि मौलिक अमौलिक किसी भी श्रेणी में नहीं आते। स्वयं ऐसे कवि अपने हृदय पर हाथ रखकर देखें और याद करें कि आज कितनी रचनाएं उन्होंने मनोयोग से पढ़ने के बाद लाइक कीं या उनपर कमेंट कीं। तब यह सोचें कि उनके लाइक और कमेंट में कितने लाइक व कमेन्ट उनकी रचना को पढ़कर हुए होंगे यकीन मानिए बहुतों को अपने कवि होने पर ग्लानि हो जाएगी।
आप मौलिकता-अमौलिकता के चक्कर में न पड़ें। आपके अनुभव में जो आपके हृदय से छनकर आये वह व्यक्त करें तो कोई उंगली नहीं उठायेगा। वैसे भी मैं अनुभव कर रहा हूँ पिछले कुछ समय से आपका पुनर्जन्म हो गया है। एक अच्छा प्रश्न करके मुझे गद्य लिखने को प्रेरित करने के लिए धन्यवाद।

हमारीवाणी

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