18/05/2018
आलिंगन की बेला थी तब दोनों खोये|
यौवन के घमण्ड में भरकर मुड़ मुड़ रोये|
निशा गयी प्राची में ऊषा झांक रही है|
तब क्यों मुझसे भीख प्रणय की माँग रही है|
विषय वासना के क्षण बीते ओ! मतवाली|
शैय्या तज दे सुबह हुई फैली उजियाली|
मेरे तेरे मध्य न दालें गलने वाली|
जब उपवन में भँवरों की गुंजार प्रबल थी|
कली कली आह्लादकारिणी पुष्ट सबल थी|
नवपल्ल्व निज छाया से दुलराने वाले|
कर फैला तत्पर प्रसून स्वागत मतवाले|
निकल गया अनबूझ पथिक सा दृष्टि न डाली|
अब क्या तेरे दर पर लेने आऊँ माली|
तेरी झोली मेरी झोली दोनों खाली|
तू भी भोला मैं भी भोला दोनों भोले|
तू शीतल ज्यों बर्फ शिला मैं जैसे ओले|
बहुत बार मन्दिर में हमने नैन मिलाये|
बातें छौंकीं सुख दुःख बाँटे अवसर पाये|
मन की प्यास कहाँ बुझ पाई युग युग पाली|
रीती गागर तू जाने कब भरने वाली|
बन्जर उर में भी मनमोहन कर हरियाली|
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