सोमवार, 25 मई 2020

न्यूटन के गति विषयक नियम


न्यूटन के गति सम्बन्धी तीन नियम दोहों में  

चलता पिण्ड न रूक सके, रुका न पाए चाल|
बिना वाह्य बल के सतत, जड़ता की पड़ताल||1||
परिवर्तित संवेग दर, बल के सम-अनुपात|
जिधर दिशा संवेग की, वही दिशा बल ख्यात||2||
क्रिया-प्रतिक्रिया साथ हो, रहे दिशा विपरीत|
बल की मात्रा सम रहे, न्यूटन कहता मीत||3||



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शुक्रवार, 22 मई 2020

भारतीय हम बाद में

पहले यूपी, एमपी, दिल्ली, हरियाणा, गुजरात के हैं।
फिर केरल, पंजाब, असम, कर्नाटक या बंगाल के हैं।
काश्मीर या कलिंग, मराठा हममें कितने देश बसे,
कोरोना ने समझाया है भारतीय हम बाद में हैं।।
सीमाओं पर बंधन इतने खड़ी चाइना वाल ज्यों,
मजदूरों की खातिर क्रोधित होकर नाचा काल ज्यों,
जैसे चूहे बारिश में बिल बाहर दौड़ लगाते हैं,
राजनीति ने फैलाया है छिन्न भिन्न कर जाल यों।।
जन-गण-मन की उड़ी धज्जियाँ असली जन लाचार है,
जननी जन्मभूमि का नारा देख लिया साकार है,
फिर भी हृदय उदार देश का जगह जगह दिख जाता है,
पीड़ित जन की मदद कर रहे लोगों की भरमार है।
विमल कुमार शुक्ल 'विमल'
9198907871

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शनिवार, 16 मई 2020

उत्पात

खून पसीना दे शहरों को मजदूरों ने खड़ा किया।
समय पड़ा तो शहरों ने ही मजदूरों को डरा दिया।
यूँ तो छत पर छतें बहुत थीं थे मालों पर माले।
कोई शरण नहीं दे पाया सबने डाले ताले।
जो मशीन बन चला रहे थे कारोबार तुम्हारे।
नर हो उनको टिका न पाये कुत्तों से दुत्कारे।
कल फिर काँधे यही मिलेंगे मृत हो चुके शहर को।
उल्टा समय-चक्र घूमा है आये बुद्धू घर को।
लेकिन उनका क्या बेचारे जो घर पहुँच न पाये।
आँखें माँ बापों की सावन त्रिया अधिक दुःख पाये।
इस युग में जब जन पेशाब को मोटर लेकर जाते।
मील हजारों पैदल चलकर आये रिश्ते नाते।
कोरोना यह मिटे मिटे ना कोई बात नहीं है।
पर शहरों की हृदयहीनता क्या उत्पात नहीं है?
विमल कुमार शुक्ल 'विमल' 9198907871

गुरुवार, 14 मई 2020

मैं बिचारा



आज फिर मेरी गुलब्बो मिल गयी बाजार में,
हो गयी ज्यादा निपुण अब प्रेम के व्यापार में,
माँगती थी मौन होकर आज फिर से चार पल,
दे दिए थे एक दिन उसने मेरी मनुहार में||

मनुहार























मैं बिचारा फँस गया चक्की के दोनों पाट में,
थी गुलबिया साथ में आई गुलब्बो बाट में,
किस तरह चीजें बदलतीं मैं बखूबी जानता हूँ,
घुस गया है चोर कोई विश्व के सम्राट में||
गुलबिया-गुलब्बो

 
















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