बुधवार, 30 सितंबर 2015

एक वो है



बन्दा चाँद पर गया है,
वहाँ काम चल रहा है।
किसी मुमताज का ताजमहल,
बन रहा है।
एक वो है जो दोनों जहाँ संभाले है,
मेरा दम तो,
जमीन पर ही निकल रहा है।

भौतिक विकास



एक चीज ही चुन पाओगे गन्ना गुड़ या शक्कर में।
थोड़ा बहुत छोड़ना होगा कुछ पाने के चक्कर में।
चाहे जितनी सेना हो उसके मुस्तैद सिपाही हों।
थोड़ी बहुत हानि निश्चित है भले विजय हो टक्कर में।
शाखें कटीं परिंदे रूठे  सूनी है आकाश धरा,
अवगुण बहुत भयानक हैं भौतिक विकास के अस्तर में।

बुधवार, 27 मई 2015

कमबख्त पेड़

मुझे पतझड़ का इन्तेजार रहता है।
चाँद तो आज भी उसी खिड़की पर है।
कमबख्त पेड़ है जो उग आया है।
मेरे उसके बीच किसी दीवार की मानिंद।
@विमल कुमार शुक्ल'विमल'

सोमवार, 27 अप्रैल 2015

यौवनभारगर्विता बाले!

संस्कृत हिंदी सहित अनेक भारोपीय भाषाओँ की जननी है। अपने इसी लगाव के तहत कभी कभार इस भाषा में काव्य रचना का प्रयास कर लेता हूँ। सुधी विद्वतजनों से प्रोत्साहन की आकांक्षा रहेगी।
26/04/2015
ऐ! बाले! त्वंकथमट्टाले केशप्रशाधयितुं तल्लीना।
गृहम् विशालं तव हे सुमुखे! किं त्वं कुलं कुटुम्बम् हीना।
कस्मै अलक संजालं क्षेपस्यसिवीथी हिंस्र जन्तु आकीर्णा।
रूपाजीवा  इव संलग्ना त्वं प्रतिभासि सुरुचि अकुलीना।।1।।
केन प्रशंसा वाञ्छसि भामिनि चंचल नयन प्रसारिणी दीना।
यौवन भार गर्विता बाले! पीनस्तनी गौरा कटि क्षीणा।
ऐ!मृगनयनी मृगयारता काम शर क्षेपण कला प्रवीना।
सुभग़े सुग्रीवेलोल लोचने पीन पयोधरे वसन विहीना।।2।।
@विमल कुमार शुक्ल'विमल'

 मेरे कुछमित्र कह रहे थे कि उन्हें संस्कृत नहीं आती इसलिए वे इस कविता को समझ नहीं पाते अतः इसका अनुवाद कर दूँ| उनकी अभिलाषा व प्रेम को देखते हुए अनुवाद प्रस्तुत है|
ऐ! बालिके! चढ़ अट्टालिका किसलिए केश निज के संवारने में लीन है|
बड़ा घर तुम्हारा व सुन्दर मुखी है नहीं लगता कुल या कुटुम्ब से हीन है|
किसलिए केश-जालक गली में बिखेरा गली हिंस्र जीवों से आकीर्ण है|
जैसे कोई वेश्या प्रतीक्षारता है उसी भांति तेरी सुरूचि अकुलीन है|
चाहती है किसकी प्रशंसा को भामिनी चलाती है चंचल नयन हो दीन है|
यौवन के भार पे इतराती बालिके सुन्दर उरोज गौर कटि तेरी क्षीण है|
ऐ मृगनयनी! शिकार की ताक में काम वाण फेंकने की कला में प्रवीण है|
सुन्दर सुकंठी अमूल्य नैन वाली तू उभरे उरोज किन्तु वसन विहीन है|

हमारीवाणी

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