शनिवार, 31 मई 2014

रसमय मित्र

29/5/1993

किसी अंग्रेजी कविता की स्मृति आधारित भावाभिव्यक्ति--
रसमय मित्र

कितनी रसमय? मित्र ! मनोहर छवि है तेरी|

बस तू आशा किरण अन्य सब छाँव घनेरी|

शाम घिरे ही लौट गेह में तुम आते हो|

बड़े प्रेम से निज बच्चों संग कुछ गाते हो|

निश्चय ही यह प्रेम गीत है गाओ प्यारे|

कानों को अच्छा लगता है मित्र हमारे|

इतनी मिठास यह दर्द कहाँ से लाते हो|

मुझको भी दो जिस मीटर में तुम गाते हो|

मुझको भी अपने भावों का सहभागी कर लो|

इसी नीड़ में फिर चाहे इहलीला कर लो|

सिर्फ आखिरी साँस तुम्हारी मृदु लय टूटे|

सुनता रहूँ निरंतर मैं जब तक तन छूटे|

काश तुम्हारा गीत सभी जग वाले सुनते|

भौतिकता से दूर तुम्हारे रंग में रंगते|

@विमल कुमार शुक्ल'विमल'

शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

हे अवनि आत्मज

www.hindisahitya.org/poet-vimal-kumar-sukl/
हे-अवनि-आत्मज/
हे अवनि आत्मज!
आज आसुरी राज जगत पर विविध वेश में विविध रूप धर।
घोर प्रलय का घोष कर रहा चोर मोदमय संत मर रहा।
शरण माँगता दिवस प्रात से साँझ आज है उच्च प्रात से।
न्याय धरणि को आज चाहिये ज्योतिपुंज का राज चाहिये।
साथ साथ हों पथिक आओ चलें अन्धकार का मन आओ दलें।
एक बार जय बोल भरतसुत और हस्तकर सद्य शस्त्रयुत।
या भवानिरिपु या कि स्वयं तन एक नष्ट करें आज काल बन।
खड्ग हस्त धर शत्रु शीश रज कर विलीन हे अवनि आत्मज!
गौरि माँगती आज रक्त रिपु सद्य समर्प दे ध्यान धान्य वपु।
@विमल कुमार शुक्ल'विमल'

सोमवार, 24 मार्च 2014

लकब

सच पूछिए तो आज भी किसी को उचित रूप से सम्बोधित करने के मामले में मैं आज भी उतना ही मूर्ख हूँ जितना मैं आज से बहुत पहले था। फरवरी 2000 में मैंने एक मुक्तक लिखा मुझे आज भी ताजा लगता है। आप भी मुलाहिजा फरमायें---
किसी ने कह दिया होगा,'चाँद' उछल पड़े।
मैंने पुकारा सही नाम तो उबल पड़े।
नालायक, बेहया, बदतमीज जाने कितने,
लकब मेरी तारीफ में निकल पड़े।
लकब-उपाधि

गुरुवार, 20 मार्च 2014

बहुत

हर कोई है दे रहा लेक्चर बहुत।
बढ़ गये हैं आजकल मच्छर बहुत।
भनभनाना खटमलों ने कर दिया शुरू।
हो गया चुनाव बाअसर बहुत।

हमारीवाणी

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