शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2013

ढंग के कपड़े



साज सिंगार प्रभाव विचित्र कभी मन में अनुमान किया करो।
ओ! सजनी! तन वस्त्र धरे पर श्री छवि का धरि ध्यान लिया करो।
रूपसि रूप की पारखी हौ तुम तो पटुता के प्रमाण दिया करो।
सृष्टिज अंग मिला सुभगे निज शक्ति अमूल्य का मान किया करो॥१॥
तन ढाँप रहे ढंग के कपड़े बहू बेटी के बीच का भेद बतावैं।
रमणी दल बेढँग वस्त्र धरे गणिका-गण का अहसास करावैं।
पहिनावा लखे जन वाद करें जननी और सास के चिन्ह गिनावैं।
ननदी और भावज भेद कहाँ पहिराव में बुद्धि सुजान सुनावैं ॥२॥
देखा अभी था तो हूक उठी कसके इसको निज अंग लगाऊँ।
देख रहा अब तो हिय में चरणाम्बुज धो चरणामृत पाऊँ।
था मन में कि कपोल छुऊँ अब है मन में निज शीश चढ़ाऊँ।
है पहिनावे में ये क्षमता कुलदीपिका से कुलहीना कराऊँ॥३॥

रविवार, 30 दिसंबर 2012

सबके वश की बात नहीं




मेरे नयनों में बस जाना सबके वश की बात नहीं।
मेरी आशाओं पर छाना सबके वश की बात नहीं।
आँसू लाख टपकते उर से जीवन के सूनेपन पर।
पर मेरे सा चुप रह जाना सबके वश की बात नहीं।
कोई मेरे प्रियतम को ले जो जी चाहे कह देता है।
सुनकर मेरे सा सह जाना सबके वश की बात नहीं।
जब जी चाहे घर में आना इतना तो हो सकता है।
मेरे चाहे बिन रुक जाना सबके वश की बात नहीं।
कोई मुझसे जितना चाहे जो चाहे ले सकता है।
पर मेरा अनुभव पा जाना सबके वश की बात नहीं।


कैनवास



वो कितनी खूबसूरत है।
एक
पेन्टर की जरूरत है।
रंग
तूलिका कैनवास।
मेरे
तेरे आस-पास।

बड़ा प्रश्न



एक मधु सी मुस्कुराहट और रेगिस्तान,
कुछ
सिमटते जख्म कुछ बाकी निशान,
एक
हकीकत सा मगर सब स्वप्न है,
जीवन
मृत्यु से बड़ा प्रश्न है।

हमारीवाणी

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