सोमवार, 9 जून 2025

घरवाली

जो घरवाली का कहा, मान न सकता मित्र।
उसे मिलें ससुराल से, चोटें बड़ी विचित्र।
चोटें बड़ी विचित्र, मिलें जो पूरी माने।
जोरू का है दास, सभी देते हैं ताने।
इसीलिए तू मान, कहे जो कुछ भी साली।
साली वश में होय, रहे वश जो घरवाली।।

मंगलवार, 3 जून 2025

एक बड़ा घर

एक बड़ा सा गॉंव का घर,
उन्नत मस्तक चूमे अम्बर,
जिसमें लग जाते सौ बिस्तर,
पूरे जवार में प्रबल प्रखर।
परिवार बढ़ा फैला लश्कर,
अब घर में हैं दर ही दर,
ऊॅंचाई घटी घट गया असर,
सिसक सिसककर करता बसर।

मंगलवार, 27 मई 2025

भण्डारा

भोजन उसे कराइए, उर से दे आशीष।
भण्डारे में कीजिए, तनिक न पैसा खीस।
तनिक न पैसा खीस, कीजिए फोटू खातिर।
लोग समझने लगे मियां तुम पूरे शातिर।
भण्डारे की आड़ दिख रहा अहं युक्त मन।
जब भूखा मिल जाए करा दो उसको भोजन।।


सोमवार, 26 मई 2025

वे ही दोषी नहीं

किसने व्यभिचारी को चुनकर
प्रतिनिधि अपना बना लिया।
और सुअर ने सत्ता पाकर,
मुॅंह कीचड़ में सना लिया।
वे ही दोषी नहीं द्यूत में,
जो नारी को हार गये हैं।
कन्धे पर गांडीव टॅंगा था,
किन्तु मौन को धार गये हैं।
अरे! हस्तिनापुर के वासी,
तुमने दुर्योधन को झेला।
तुम भी उतने ही दोषी हो,
कुरुक्षेत्र में लगा झमेला।
सत्ता का आस्वाद लगा है,
तुम लोगों की दाढ़ों में भी।
इसीलिए हर ओर जहर है,
कैपसूल में काढ़ों में भी।
तुमको रण में घुसकर ही,
मरना होगा इतना तय है।
माथे पर कलंक गाथा ले,
तिरना होगा इतना तय है।

हमारीवाणी

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