सोमवार, 28 अप्रैल 2025

ले गया

कोई बल के घमण्ड, छीन के प्रचण्ड हुआ,
कोई हो विनम्र हाथ जोड़ मॉंग ले गया।
जो भी कहें होशियार, चालबाज, कपटी या,
रहा धंधेबाज झूठ सॉंच धॉंग ले गया।
कोई दीन-हीन बना, द्रवित हृदय छना,
करों को प्रसार दान झोली टॉंग ले गया।
जो भी जिस योग्य रहा उसी भाॅंति ले गया वो,
अपनी ही ले गया न मेरी भॉंग ले गया।।

सोमवार, 7 अप्रैल 2025

विद्यालयों में लूट खसोट

आजकल विद्यालयों में प्रवेश शुरू हैं। तमाम ज्ञानी लोग अपना ज्ञान दे रहे स्कूल वाले किताबों कापियों और ड्रेस इत्यादि में लूट रहे हैं। कुछ लोग गरिया भी रहे हैं प्रबन्धकों को‌। मैं भी विद्यालय प्रबन्धक हूॅं और निजी तौर पर पिछले कई वर्षों से बहुत व्यथित भी। जिन बच्चों को मैंने किसी समय अपने विद्यालय में पढ़ाया, आज उनमें से बहुतों के बच्चे मेरे पास नहीं पढ़ते। चूंकि उनके माता-पिता निर्धन थे और स्कूल भी कम थे, आज स्कूलों की संख्या अधिक है उनकी जेब में पैसा है इसलिए उन्हें अब मेरा स्कूल अपने बच्चों के लिए निम्न श्रेणी का लगता है। जबकि मैं आज भी उनके लिए समर्पित भाव से काम करता हूॅं। मेरी प्राथमिक कक्षाओं का शुल्क 160 रुपए मासिक है और मजदूरों के बच्चों को दृष्टिगत रखते हुए है मेरे स्कूल में ड्रेस लागू नहीं है बच्चे पुरानी किताबें खरीद सकते हैं तीन वर्ष से मैंने कोर्स नहीं बदला है। मेरे पास वे बच्चे पढ़ने नहीं आते जिन्हें लूटा जा सके। मेरी 650 की छात्र संख्या 350 रह गयी है क्योंकि स्कूल वाहन सुविधा देकर लूटना नहीं चाहता। ये जो स्कूल लूट रहे हैं इसके लिए अभिभावक बड़ी मात्रा में दोषी है। अभिभावक जब तक अपने धन से स्कूलों को तौलेगा, स्कूल पलड़े पर बैठे रहेंगे। आप को बुरा लगे तो लगा करें। फेसबुकिये ज्ञानियों का ज्ञान बेमानी है।

मंगलवार, 1 अप्रैल 2025

इतिहास

मैं किसको सच मानूॅं,
देखने वाले रहे नहीं,
लिखने वाले तटस्थ होते नहीं,
मैंने इतिहास की ओर से मुॅंह मोड़ लिया है,
नाता भविष्य से जोड़ लिया है।
तुम सब गाओ अपनी-अपनी,
मैं भी अपनी गाता हूॅं।
एक नयी सड़क बनाता हूॅं।
उसके लिए सब खाईयाॅं पटेंगी,
सब टीले टूटेंगे।
रोने वाले रोयेंगे, 
मजे लूटने वाले मजे लूटेंगे,
इतिहास के व्याख्याकार, 
मजे करते हैं, 
और भ्रमित करते हैं।

बुधवार, 26 मार्च 2025

विदेशी बनाम देशी शब्दावली

वे साहित्यकार जो अन्य भाषा की शब्दावली को भारतीय भाषा में परिवर्तित करके लिखना चाहते हैं उनके लिए मेरा विचार।मूल भाषा के शब्दों को विदेशी भाषा के शब्दों से स्थानांतरित करना और विदेशी शब्दों को अंगीकार करना दो अलग-अलग चीजें हैं। भारतीय संस्कृति ही आत्मसात करने की प्रवृत्ति पर आधारित है। आज भाषा और संस्कृति का जो स्वरूप हमें दिखाई देता है उसमें देवों,‌दानवों, यक्षों, राक्षसों, किन्नरों, गन्धर्वों, नागों इत्यादि की संस्कृतियों के साथ साथ हूण, कुषाण, रोमन, यूनानी, अरबी, फारसी, तिब्बती, वर्मी और वर्तमान में अंग्रेजी आदि का विस्तृत प्रभाव है, हम स्थिर नहीं रह सकते। रेल को लौह पथगामिनी लिखने पर, स्टेशन, टिकट, कोट, पैण्ट, शर्ट, साइकिल, पम्प, पेट्रोल, डीजल, टोल प्लाजा, आदि तमाम शब्दों का हिन्दी करण करना होगा। आप साहित्यकार होने के नाते पुस्तकों में इनका हिन्दी कृत रूप प्रयोग कर लेंगे किन्तु जनसामान्य इन्हें अपना नहीं पायेगा। वह अपने ही ढंग से चलता है वैसे भी सिनेमा और मोबाइल के युग में साहित्य की भूमिका बहुत सीमित हो गयी है।

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