मंगलवार, 31 मई 2022

हिन्दी मात्रा प्रयोग

बिन मात्रा के अजगर, अदरक, कटहल, शलजम, कलम।
हलचल, बरतन, खटपट, सरपट, टमटम, कलकल, जलम।।1।।
आ से आम, आग में भूना, खट्टा मीठा स्वाद।
खाना-दाना पेड़ दे रहा, खुद खाता है खाद।।2।।
किरन किशन से झगड़ा करती, बिना बात की बात।
इमली तो इठलाती फिरती, इतराती इफरात।।3।।
ईश्वर का ईनाम सभी कुछ, मीठा, तीखा, फीक।
खीर, खरी, खीरा, ककड़ी की, बात बड़ी बारीक।।4।।
उड़द, उड़ीसा, उबटन, उपला, उधम अउर उत्पात।
सुघड़, माधुरी, सुन्दर, युवती, फुलवारी, पुलकात।।5।।
सूटर पहने फुल्लू  फूले, ऊटपटाँगा ऊन।
ऊँट पूँछ कूबड़ को भूला, धाँसू देहरादून।।6।।
ऋषि के गृह मृग-मृगी टहलते, मृगतृष्णा से दूर।
कृषक, कृष्ण, कृषि, कृपा, गृहस्थी, घृत अमृत भरपूर।।7।।
एक अनेक नेक क्यों चरचे, बाँचे लेख अनन्त।
साँचे राँचे प्रेम नेम में, राधे रटते संत।।8।।
ऐरावत ने ऐनक पहनी, भैया है हैरान।
गैया-भैंस न शैय्या छोड़े, हो गये हैं शैतान।।9।।
ओंकार को रोज भजो जो, बोलो हरिहरिओम।
रोग, शोक, मद, मोह, छोड़कर, घूमो धरती-व्योम।।10।।
औरत, औषधि, मौसी, भौजी, लौकी, नौका, चौक।
गौरव, रौनक, रौशन, यौवन, दौलत, लौटा, शौक।।11।।
नग को नंग बना देती है, जग में करती जंग।
अं की बिन्दी का कमाल है, रग में भरती रंग।।12।।
अः की बात निराली कितनी, मजेदार निशि-अहः।
छः दिन कर्म रविः विश्रामः, सुखपूर्णः मम मनः।।13।।

मंगलवार, 24 मई 2022

जुआ वैध या अवैध

मैं अपने सुधी पाठकों से यह जानना चाहता हूँ कि क्या देश में जुआ खेलना वैध है अथवा अवैध। या फिर वैध और अवैध जुए के मध्य कोई विभाजक रेखा है? 
हमारे समाज में जुए का इतिहास बड़ा पुराना है।  महाभारत काल से भी पुराना। राजा नल अपना सबकुछ जुए में हार गए थे यह युधिष्ठिर से बहुत पहले की कहानी है। मेरा जिस जुए से प्रथम बार परिचय हुआ वह शायद गाँव में गोली-कंचों का अथवा पैसों का रहा। लोगों को खेलते देखा बस कभी कभार खुद भी खेला होगा कुछ याद नहीं। इस संदर्भ में मेरे पिता जी अति कठोर थे। फिर लोगों को ताश खेलते देखा किन्तु खेला कभी नहीं इतना स्पष्ट है। उन दिनों कभी कभी पुलिस जुआरियों के विरुद्ध कार्यवाही कर देती थी। फिर दौर आया लॉटरी का। सबसे अधिक परिष्कृत और सरकार के द्वारा संचालित। लाखों परिवार विनष्ट हो गए लॉटरी के चक्कर में।अन्ततः सरकार ने बन्द करा दिया। यद्यपि लॉटरी दो चार बार लेखक ने भी खरीदी।
लॉटरी बन्द हुई तो सट्टा शुरू हो गया। अभी चल रहा है। जब तब कार्यवाही भी होती है किन्तु परिणाम शून्य। अब तो सट्टा अन्तर्राष्ट्रीय हो गया है।
कुछ समय से जुए का नया स्वरूप आया है। इन्टरनेट पर ऐप डाउनलोड करो। खेलो जीतो और खाते में ट्रांसफर करो। विज्ञापन भी इसका जबरदस्त। "हैलो दोस्तों यह कार मैंने लूडो खेलकर जीती है। तुम भी जीत सकते हो। ऐप डाउनलोड करो। साइट का पता है कखग.com।"
फिर एक्सप्रेस की स्पीड से चेतावनी, "कृपया 18 वर्ष से ऊपर के लोगों के लिए। वित्तीय जोखिम की संभावना शामिल। अपनी जिम्मेदारी और जोखिम पर खेलें। इसकी लत लग सकती है।" बहुत बार क्या कहा जा रहा है समझ नहीं आता।
मेरा प्रश्न यही है कि इस प्रकार का जुआ यदि ऑनलाइन सही है तो ऑफलाइन गलत किस प्रकार से है। यदि दोनों सही हैं तो एक पीछे पुलिस दौड़ती है और दूसरे कमरों में बैठ कर जुआ खेलते रहे हैं यह बिल्कुल उचित नहीं। यदि दोनों गलत हैं तो सरकार को चाहिए कि अविलम्ब ऐसे जुए और साइटों को बंद करें जो युवा शक्ति को अनुत्पादक व हानिकारक व्यवसायों के लिए प्रेरित कर रही हैं।
मैं समझता हूँ कि वकील लोग जो अनाप शनाप मामले ले जाकर कोर्ट में बदनामी झेलते हैं वे इस मुद्दे पर कुछ सार्थक करके सम्मान अर्जित कर सकते हैं। सरकार में बैठे लोगों का भी यह दायित्व है कि युवा पीढ़ी को अंधकार के गर्त में जाने से रोके।











गुरुवार, 19 मई 2022

मुबारक

1
तुम्हें हुक्मरानी तुम्हारी मुबारक,
हमें दिन भरे की दिहाड़ी मुबारक,
कहाँ काशी काबा में सिर को घुसेड़ूँ,
नचाए सभी को मदारी मुबारक।
2
सब हवा के साथ बहते जा रहे हैं,
जागरण का ध्वज सभी लहरा रहे हैं,
मैं विवश हूँ देखने को पूर्व दिशि मेंं,
मेघ कुछ उत्पात हित गहरा रहे हैं।
3
चोंचों में जो कीट पकड़ना चाह रहे,
वक्ष धरा का तोड़ा जाए चाह रहे,
वहीं घास की पत्ती में जो जन्तु छिपे,
हर हलचल पर घबराकर भर आह रहे।

मदारी-भगवान, 

सोमवार, 16 मई 2022

बुद्ध ने क्या दिया

फेसबुक पर एक भाई ने पूछा कि गौतम बुद्ध ने देश को दिया क्या है? तो मैं अल्पबुद्धि व्यक्ति कुछ लिखने का साहस कर रहा हूँ। कुछ अनुचित लिखा हो तो क्षमा करें।
बन्धु वर्तमान में ऐसे विवादों की आवश्यकता नहीं है। गौतम बुद्ध भारतीय वाङमय में ऐसे विचारक हैं जिन्होंने समाज को एक नवीन मानवतावादी दर्शन प्रदान किया जो सत्य, प्रेम और अहिंसा पर आधारित था। वह महात्मा अगस्त्य(शैव मत के प्रचारक) के पश्चात ऐसे दूसरे विद्वान थे जिन्होंने भारतीय मनीषा को सम्पूर्ण विश्व में प्रसारित कर पाने में और बड़े बड़े राजा महाराजाओं को अपने सिद्धांतों से अभिभूत करने में सफलता पाई थी।  गौतम बुद्ध ने जिस मध्यम मार्ग को अपनाने की बात कही है वह ऐसा मार्ग है जिसकी उपेक्षा करने के कारण हम असंख्य सुविधाओं से युक्त होने पर भी विषादग्रस्त हैं।
रही बात सनातन धर्म व बौद्धों के बीच मतभिन्नता और तोड़फोड़ की तो विगत की बात है जिस की चर्चा न हो तो बेहतर।
गौतम बुद्ध ने अपने किसी शिष्य को सनातन धर्म पर आक्रमण के लिए नहीं उकसाया, न ही उन्होंने अन्य धर्मों के विनाश की बात कही। यदि कालांतर में लोग उनके पदचिन्हों पर नहीं चले तो दोष हमारा है। 
आज आवश्यकता उनका विरोध करने की है जो यह कहते हैं कि उनका मत ही सर्वश्रेष्ठ है और अन्य मतों के अनुयायियों को जीवन का अधिकार नहीं है।
हम अत्यधिक सौभाग्यशाली राष्ट्र हैं कि भारतीय मूल का कोई भी मत शैव, शाक्त, वैष्णव, बौद्ध, जैन, सिख आदि अन्य धर्म व मतों के उच्छेद की चर्चा नहीं करता। अपितु सभी लोगों को शान्ति से अपने अपने आचार विचार को मानने की स्वतंत्रता देता है। हम तो हम तो चार्वाक जैसे नास्तिक का दर्शन भी स्वीकार कर भारतीय वाङ्मय में स्थान प्रदान करते हैं।
बौद्धों और सनातनियों के मध्य जो झगड़े के आरोप लगते हैं मुझे निजी स्तर पर समझ नहीं आते। जो समाज मुक्त हृदय से महाभारत काल में यवनों, शकों, हूणों से सम्बन्ध स्थापित करता है। चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में यूनानियों से व्यापारिक व बौद्धिक सम्बन्ध स्थापित करता है। प्रथम शताब्दी में ईसा मसीह को भारत आकर ज्ञान प्राप्त करने का अवसर देता है। दूसरी तीसरी शताब्दी में अरबों से व्यापार करता है वह बौद्ध धर्म के लोगों को लेकर इतना असहिष्णु रहा हो समझ नहीं आता। हाँ यह हो सकता है कि राजे महाराजों ने धर्म का नाम लेकर अपना उल्लू सीधा किया हो और निरीह जनता को बौद्ध व सनातन धर्म के नाम पर लड़ाया हो।
तो हाथ जोड़कर समस्त पाठकों से निवेदन है कि बुद्ध को बुद्ध ही रहने दें और बुद्ध बनें। गौतम बुद्ध न सही बुद्धिमान सही।

हमारीवाणी

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