रविवार, 20 मार्च 2022

चौराहे

चौराहों से डर लगता है। कई प्रश्न प्रताड़ित करते हैं। किधर जाएं? कौन सा मार्ग अपनाएं? किस साधन से जाएं? किसको साथ ले जाएं? 
यह सब पुराने प्रश्न हैं और तब खड़े होते हैं जब हम सकुशल चौराहे तक पहुँचें। आजकल तो समस्या यह है कि चौराहे तक पहुँचने से पहले ही कदम जाम हो जाते हैं। हम ऐसी भीड़ का हिस्सा हो जाते हैं कि गिंजाइयों (एक गेरुए रंग का आधा से एक इंच लम्बाई का कीड़ा) का खानदान भी शरमा जाए। यदि अनन्तता का अनुभव करना हो तो उत्तर भारत के किसी भी महानगर की सड़कों पर अनुभव कर सकते हो। चलो चौराहा पार हो लें फिर पता चले गलत मार्ग पर आ गए हैं तो बहुत बार सही मार्ग पर आने में इतना समय लगता है और इतनी दूरी तय करनी पड़ती है कि गन्तव्य तक पहुँचने का कोई लाभ नहीं रहता।
हमारा जीवन तो सतत चौराहों की श्रृंखला है। सावधानी बरतें। मैंने एक बार अपने छोटे बेटे के साथ पिहानी से सीतापुर, सीतापुर से लखीमपुर खीरी और लखीमपुर खीरी से शाहजहांपुर तथा शाहजहांपुर से फिर पिहानी की यात्रा की तो एक आश्चर्यजनक तथ्य उभर कर आया कि हर रास्ता लखनऊ की ओर जाता है और वही रास्ता दिल्ली भी जाता है। यकीन मानो इस यात्रा में यह तथ्य जीवन की फिलासफी बन गया। सारे मार्ग भगवान की तरफ और सारे मार्ग शैतान की तरफ। बस हमें यह तय करना है कि हमारा मुँह किधर है और पीठ किधर।
साधन कोई भी हो हर साधन अपने आप में विशिष्ट। बैलगाड़ी और रेलगाड़ी दोनों में कोई तुलना नहीं। दोनों की अपनी उपयोगिता और अपना आनंद। हमें तो बस अपनी रुचि और आवश्यकता पर ध्यान देना है साधन अपने आप में समझ आ जाएगा। जहाँ काम आवे सुई काह करै तरवारि।
जाना अकेले ही है साथ केवल वहीं तक जहाँ से लक्ष्य बिछुड़ जाते हैं सोच बदल जाती है। 

शनिवार, 5 मार्च 2022

बेटे बहू


जिनके हित में बंजर कर दी अपनी हरी बहार में,
बेटे बहू नहीं आते हैं अब घर पर त्यौहार में।।
अपनी अपनी ध्वजा उठाए सब विकास की चाह रहे,
रोजीरोटी का रण लड़ते देख विजय की राह रहे।
कुछ तो खोए हुए तरक्की की सतरंग मल्हार में।।
बाहर बेटा गया अकेला दो होकर अब रहता है,
लेकर बहू आ रहा घर पर हर महिने ही कहता है,
आँखें उलझी हुई प्रतीक्षारूपी काँस-सिवार में।।
बेटे के सिर सेहरा देखें मन की चाह मरी मन में,
कभी नहीं जानी है मस्ती पोती-पोतों के धन में,
सिसक सिसक कर कटे जिंदगी जीवन की पतझार में।।

सोमवार, 3 जनवरी 2022

इतिहास तो अंततः सभी का एक ही है


1. "ये मेरा नववर्ष नहीं है, मेरा नववर्ष चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से प्रारंभ होता है। मैं इसकी बधाई न लूँगा न दूँगा।" 
2. "मैं क्रिसमस की बधाई क्यों दूँ। यह मेरा त्यौहार नहीं है।"
3. "मोमबत्ती जलाकर नहीं, केक काटकर नहीं बल्कि दूध पीकर मंत्रोच्चार के साथ जन्मदिन मनाऊँगा।"
4. "मैं फादर डे , मदर डे, टीचर डे, वैलेंटाइन डे कुछ नहीं मनाता, यह हमारी संस्कृति नहीं है।"
ये सब मैं नहीं कहता। वे कहते हैं जो शर्ट, पैंट और टाई पहनते हैं। बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाना पसंद करते हैं। बच्चों को चरणस्पर्श और प्रणाम की जगह गुड मॉर्निंग सिखाते हैं और कुत्ते को डॉगी कहलवाते हैं। सिर पर चोटी गायब है लेकिन तिलक लगाते हैं। परिवार में कोई स्वर्गवासी हो तो सिर घुटाने में शर्माते हैं और सिर्फ कटिंग करा के परिवारी होने का कर्तव्य निभाते हैं। पूजापाठ के अवसर पर पंडित से कहते हैं कि जल्दी निपटाओ। यज्ञोपवीत बस विवाह के आसपास चार दिन पहनते हैं। गौसंरक्षण का नारा और रिक्शेवाले की बेइज्जती दोनों साथ साथ चलते हैं। ऑफिस में लंबा सा तिलक लगाकर बैठते हैं पूर्ण धार्मिक होने का लेक्चर देते हैं और रिश्वत खाते हैं तो डकार भी नहीं लेते। कहो तो खींसेंं निकाल देते हैं।
नीम हकीम खतरेजान। स्वयं को सनातनी कहते हैं किन्तु 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना का तिरस्कार कर अन्य समाजों को अपमानित करने का भाव भी हृदय में पाले हुए हैं। हम तो सहिष्णु रहे हैं, हम असफल हो गए संसार को सहिष्णुता सिखाने मेंं। हाँ म्लेच्छों से अमानवीयता सीखकर असहिष्णु होने का अभ्यास करने लग गए हैं। यह अत्यधिक विचित्र है कि हम धीरे धीरे असहिष्णु होते जा रहे हैं और सहिष्णु होने का ठप्पा भी छोड़ने में शर्मा रहे हैं। 
मेरी बात करो तो मैं यह सोच रहा हूँ कि मैं वैष्णव हूँ? शैव हूँ?शाक्त हूँ?  साईं भक्त हूँ? वेदाचारी हूँ? शिश्नपूजक हूँ? कापालिक हूँ? वैरागी हूँ? आनन्दमार्गी हूँ? या फिर नाग, गन्धर्व, यक्ष, रक्ष, किन्नर, सुर, असुर, देव, दानव, आर्य, द्रविड़ आदि से कोई हूँ। अथवा हूण, शक, यवन आदि में से हूँ। या फिर इस सबका घालमेल हूँ। यह प्रश्न आजकल के सभी तथाकथित धर्म व समुदायों से अपेक्षित है चाहे वे हिन्दू, सिक्ख, बौद्ध, जैन आदि भारतीय पृष्ठभूमि के हों अथवा मुस्लिम, ईसाई, यहूदी, पारसी आदि विदेशी पृष्ठभूमि के हों। इतिहास तो अंततः सभी का एक है और मूल भी। इस सबमें मनुष्यता को कहाँ खो दिया?



सोमवार, 20 दिसंबर 2021

ईश्वर सहायता करे

समय ने कविता के क्षेत्र से राजनीति के क्षेत्र में पटक दिया। एक साधारण अध्यापक हूँ, राजनीति की बारीकियाँ नहीं समझता। न देना जानता हूँ न माँगना। किसी के काम आता हूँ यह भी मुझे नहीं पता। फिलहाल मैं लोगों से काम नहीं ले पाता यह मुझे लगता है। मेरे से किसी का कोई काम हो जाए या किसी को कुछ मिल जाए अथवा मेरा कोई काम किसी से चल जाए यह ईश्वर की अनुकम्पा है। अपना सिद्धांत है अजगर करै न चाकरी
छोटे भाई हैं। आम आदमी पार्टी से 155 विधानसभा शाहाबाद से विधायक पद के प्रत्याशी हैं। व्यवहार कुशल हैं, क्षेत्र में जनप्रिय हैं, विजय प्राप्ति की संभावनाओं और आत्मविश्वास से ओतप्रोत हैं। शिवाजी की भाँति 90 सिपाही लेकर औरंगजेब की 10000 की  सेना से टकराने और पराजित करने का हुनर रखते हैं। दो बार जिला पंचायत सदस्य पद के लिए अपार समर्थन व मत भी प्राप्त कर चुके हैं।
लोगों ने दोनों बार कहा तुम न जीतोगे मगर जीते। इस बार भी लोग अनुमान लगा रहे हैं। इनके आसपास जीतोगे या नहीं जीतोगे का कयास लगाने वालों की बड़ी भीड़ है। जो अपने अपने अनुमान सही होने का दावा करती है। वे लोग तो सबसे आगे बढ़कर भविष्य बताते हैं जिन्होंने कभी चुनाव नहीं लड़ा।  मैं अपने छोटे भाई को वैसे ही जानता हूँ जैसे माँ अपने बालक को। यह भीड़ की नहीं सुनते। इन्हें पता होता है कि यही जीतेंगे। सफलता के लिए यह आवश्यक है। भीड़ भटकाती है और जापान जाने वाले को रंगून पहुँचाती है। अपने सीमित संसाधनों के द्वारा एक बड़े लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक अच्छी योजना सदैव फलवती होती है। यह बात इन्हें पता है। इस योजना निर्माण का गुरुतर दायित्व निभाने में मुझे अपना योगदान देना है। ईश्वर मेरा सहायक हो।

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